लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी Loktantra Me Satta Ki Sajhedaari Subjective 2023

Loktantra Me Satta Ki Sajhedaari Subjective

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. धर्म-निरपेक्ष राज्य से क्या समझते हैं ?
उत्तर-वैसा राज्य जिसमें किसी भी धर्म विशेष को प्राथमिकता न देकर सभी धर्मों को समान आदर प्राप्त हो उसे धर्म-निरपेक्ष राज्य कहते हैं। जैसे-भारत ।


प्रश्न 2. सांप्रदायिकता की परिभाषा दें।
उत्तर-जब हम यह कहते हैं कि धर्म ही समुदाय का निर्माण करती है तो सांप्रदायिक राजनीति का जन्म होता है और इस अवधारणा पर आधारित सोच ही सांप्रदायिकता है। इसके अनुसार एक धर्म विशेष में आस्था रखनेवाले एक ही समुदाय के होते हैं और उनके मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण हित एक जैसे होते हैं।


प्रश्न 3. साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये आप क्या करेंगे ?
उत्तर भारत में विभिन्न धर्मों के लोग निवास करते हैं । धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति के कारण साम्प्रदायिक सद्भाव फलतः के स्थान पर साम्प्रदायिक संघर्ष का जन्म होता है। साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए करने शिक्षा व जागरुकता का विकास, विभिन्न धर्म के लोगों में आपसी समझ का विकासतथा धर्म के राजनीतिक उपयोग पर रोक लगाना आवश्यक है।


प्रश्न 4. सामाजिक विभाजन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-प्रत्येक समाज में लोगों के जन्म, भाषा, जाति, धर्म के आधार पर विभेद होना स्वाभाविक है। इन आधारों पर लोग अलग-अलग समुदायों से संबद्ध हो जाते हैं तो उसे सामाजिक विभाजन कहा जाता है। भारत में जाति के आधार पर सवर्ण, दलित, पिछड़ी जातियों के समुदाय सामाजिक विभाजन के उदाहरण हैं। 


प्रश्न 5. लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ किस प्रकार अनेक तरह के सामाजिक विभाजनों को संभालती हैं? उदाहरण के साथ बतावें।
उत्तर-समानता और स्वतंत्रता, लोकतंत्र के दो आधार हैं। समानता का सिद्धांत जाति, धर्म, वंश, लिंग, भाषा क्षेत्र जैसे किसी भी आधार पर व्यक्ति के विभेद को अस्वीकार करता है। इसकी जगह कानून के समक्ष समानता, समान अवसर, समान संरक्षा की स्थापना करता है।  स्वतंत्रता के अंतर्गत सभी व्यक्तियों को समान स्वतंत्रता प्रदान की जाती है जिसमें भाषण एवं अभिव्यक्ति, संघ-संगठन बनाने, पेशा व्यवसाय चुनने, मताधिकार आदि शामिल हैं।  


              दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

1. भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है ?
उत्तर—यद्यपि मनुष्य जाति की आबादी में महिलाओं की संख्या आधी है, पर सार्वजनिक जीवन में खासकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य है। पहले सिफ पुरुष वर्ग को ही सार्वजनिक मामलों में भागीदारी करने, वोट देने या सार्वजनिक पदों के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति थी । सार्वजनिक जीवन में हिस्सेदारी हेतु महिलाओं को काफी मेहनत करनी पड़ी। महिलाओं के प्रति समाज के घटिया सोच के कारण ही महिला आंदोलन की शुरुआत हुई । महिला आंदोलन की मुख्य माँगों में सत्ता में भागीदारी की माँग सर्वोपरि रही है। औरतों ने सोचना शुरू कर दिया कि जब तक औरतों का सत्ता पर नियंत्रण नहीं होगा तब तक इस समस्या का निपटारा नहीं होगा । फलतः राजनीतिक गलियारों में इस बात पर बहस छिड़ गयी कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने का उत्तम तरीका यह होगा कि चुने हुए प्रतिनिधि की हिस्सेदारी बढ़ायी जाए। यद्यपि भारत के लोक सभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 59 हो गई है। फिर भी इसका प्रतिशत 11% के नीचे ही है। आज भी आम परिवार के महिलाओं को सांसद या विधायक बनने का अवसर क्षीण है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना विभेद लोकतंत्र के लिए शुभ होगा। भारत में हाल में महिलाओं को विधायिका में 33
प्रतिशत आरक्षण देने की बात संसद में पारित हो चुकी है


 प्रश्न 2. सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं ?
उत्तर- सामाजिक विभाजन तब होता है जब कुछ सामाजिक अन्तर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं। सवर्णों और दलितों का अंतर एक सामाजिक विभाजन है, क्योंकि दलित संपूर्ण देश में आमतौर पर गरीब, वंचित एवं बेघर हैं और भेदभाव का शिकार हैं, जबकि सवर्ण आम तौर पर सम्पन्न एवं सुविधायुक्त हैं, अर्थात् दलितों को महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं। अतः, हम कह सकते हैं कि जब एक तरह का सामाजिक अंतर अन्य अंतरों से ज्यादामहत्त्वपूर्ण बन जाता है और लोगों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं तो इससे सामाजिक विभाजन की स्थिति पैदा होती है ।


प्रश्न 3. दो कारण बताएँ कि क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते ।
उत्तर-जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते, इसके दो कारण हैं
(i) जिस निर्वाचन क्षेत्र में जिस जाति के मतदाताओं की संख्या अधिक होती है, प्राय: सभी राजनीतिक दल उसी जाति के उम्मीदवार को टिकट देते हैं। अतः जाति विशेष के मतदाताओं के वोट विभिन्न दलों के उम्मीदवारों के बीच बँट जाते हैं।
(ii) उम्मीदवार को अपनी जाति के मतदाताओं के साथ-साथ अन्य जातियों के मतदाताओं के मत की आवश्यकता जीतने के लिए होती है।


प्रश्न 4. सत्तर के दशक से आधुनिक दशक के बीच भारतीय लोकतंत्र का सफर

उत्तर- (सामाजिक न्याय के संदर्भ में) का संक्षिप्त वर्णन करें । उत्तर-सत्तर के दशक के पूर्व भारत की राजनीति अवचेतना सुविधा-परस्त हित समूह के बीच झूलती रही। दूसरे शब्दों में कहें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 1967 तक राजनीति में सवर्ण जातियों का वर्चस्व रहा । सत्तर से नब्बे तक के दशक के बीच सवर्ण और मध्यम पिछड़े जातियों में सत्ता पर कब्जा के लिए संघर्ष चला। नब्बे के दशक के उपरांत पिछड़े जातियों का


प्रश्न 5. भाषा नीति क्या है ?
उत्तर- भारत वास्तव में विविधतापूर्ण देश है जहाँ 114 से अधिक प्रमुख भाषाओं का प्रयोग होता है। इसमें इन सभी भाषाओं के प्रति आदर होना चाहिए। ये सब मिलकर हमारी भाषाई विरासत को समृद्ध बनाते हैं तथा उन्हें साथ विकसित होने में मदद करते हैं। अतः प्रमुख भाषाओं को समाहित करने की नीति ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है। भारतीय संविधान में प्रमुख भाषाओं को समाहित किया गया है। जैसे-हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला, तेलगु, कन्नड़ आदि। यही भाषा नीति है। इसे अपना कर राष्ट्रीय एकता को सबल बनाया गया है।


 

Leave a Comment

error: Content is protected !!